विधवा बेटी के पुर्नविवाह को लेकर समाज ने बहिष्कृत कर 25 हजार रूपए जुर्माने का सुनाया फरमान
बालाघाट:- बालाघाट जिले की यह वह बेबस पिता और परिवार है, जिसे, उसके ही समाज ने बेटी के पुर्नविवाह कराए जाने पर समाज से बहिष्कृत कर 25 हजार रूपए जुर्माने का फरमान सुनाया है। जिसके बाद से समाज के लोगों ने परिवार से नाता तोड़ दिया है, अब बेबस पिता और परिवार, समाज के सुनाए गए इस फरमान से व्यथित और परेशान है और वह चाहता है कि इस मामले में प्रशासन उसे न्याय दिलाए। यह घटना 14 फरवरी 2026 का है जों यह घटना दरअसल, जिले के लांजी तहसील के मंडई टेकरी निवासी 73 वर्षीय मानिक सोनवाने की बेटी के पति की वर्ष 2022 में गंभीर बीमारी से मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद से बेटी तीन सालों तक घर पर रही। 8 जनवरी 2026 को उसने अपनी विधवा पुत्री का पुर्नविवाह महाराष्ट्र रामटेक निवासी युवक से कराया। जिसे समाज ने स्वीकार नहीं किया गया और 16 जनवरी को समाज उसे, 10 साल की अवधि के लिये जाति समाज से ना केवल बहिष्कृत कर दिया बल्कि उस पर 25 हजार रूपये का जुर्माना भी लगाया है। अपनी विधवा बेटी की नई गृहस्थी बसाकर पुर्नविवाह करवाने वाले इस पिता अब प्रशासन से न्याय चाहता है। क्षेत्रीय विधायक भी बेटी के पुर्नविवाह की परंपरा का उचित करार देते हुए सामाजिक निर्णय को गलत बता रहे है। उधर एसडीएम कमलचंद्र सिंहसार ने बताया कि इस मामले की जांच की जा रही है यदि जांच में मामला अपराधिक पाया जाता है तो अपराध दर्ज कराया जाएगा और सामाजिक बात होती है तो काउंसलिंग और समझाईश देकर मामला का निराकरण कराया जाएगा। पिता मानिक सोनवाने ने बताया कि पति की बीमारी से मौतह होने के बाद से बेटी 3 साल तक वह घर में रही। अब रिश्ता आया था। दोनों एक-दूसरे को पसंद करते थे तो बेटी का पुर्नविवाह कराया है। जाति समाज के लोगों ने कहा कि लड़की को भगा दीजिये, समाज के लोगों ने बहिष्कार किया 25 हजार रूपये जुर्माना देने को कहा। भाभी मीना सोनवाने ने बताया कि समाज के लोगों द्वारा विधवा की शादी दूसरे समाज में करने से नाराज होकर हमारा बहिष्कार किए है। समाज के लोग कहते है कि इनके जात में नहीं रखा जायेगा। जिसके कारण समाज ने उन्हें 10 वर्ष के लिए समाज से बाहर करने के साथ ही 25 हजार जुर्माना लगाया है। साथ ही ननद की शादी में आए लोगों से भी वे यही कह रहे है। इस मामले में समाज प्रतिनिधि अजय पालेवार ने बताया कि परिवार का बहिष्कृत नहीं किए है, पहले से जो चलता आ रहा है, समाज के पूर्वजो के हिसाब से समाज के विपरित जाकर दूसरे समाज के युवक से बेटी की शादी कराए है, उन्होंने ही पहले समाज को अपना नहीं समझा, समाज का बहिष्कृत किया। अब जिसे उचित लगता है, वह जाए, किसी के साथ जाने नहीं जाने पर कोई जबरदस्ती नहीं है, सबकी आजादी है। हम अकेले कोई निर्णय नहीं थोपते है, समाज की राय के अनुसार निर्णय लिया गया है। सामाजिक बहिष्कार नहीं है। हम समाज को जोड़ने आए है, उन्हें तो समाज में मिलना है, लेकिन उन्होंने समाज के विरूद्ध जाकर बेटी की शादी कराए है, यदि समाज में कर लेते बेटी की शादी तो कोई तकलीफ नहीं थी।

