ट्रंप जरूर मना रहे जीत का जश्न, लेकिन जंग के बाद ईरान के ‘कब्जे’ में दुनिया की इकोनॉमी

अमेरिका-ईरान के बीच 39 दिन की जंग सीजफायर पर रुक गई है. ट्रंप इसे अपनी जीत बता रहे हैं, लेकिन असली बाजी ईरान मारता दिख रहा है. दुनिया के 20% कच्चे तेल वाले रूट ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पर अब ईरान का नियंत्रण होगा. यहां जहाजों से ‘टोल टैक्स’ वसूला जाएगा. ईरान का यह नया दांव ग्लोबल ऑयल मार्केट का खेल बदल देगा। अमेरिका और ईरान के बीच 39 दिनों तक चला टकराव अब एक सीजफायर (संघर्ष विराम) पर आकर ठहर गया है. वाशिंगटन और तेहरान, दोनों ही इस सौदे को अपनी-अपनी बैलेंस शीट में ‘प्रॉफिट’ के तौर पर दर्ज कर रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे अपनी कूटनीतिक और सैन्य जीत बता रहे हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार का रास्ता फिर से खुल गया है. लेकिन, अगर इस पूरी स्थिति का ग्लोबल इकॉनमी के नजरिए से विश्लेषण किया जाए, तो कहानी कुछ और ही तस्वीर पेश करती है. एक ऐसा युद्ध जिसने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया और उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया, उसी युद्ध ने ग्लोबल सप्लाई चेन और दुनिया के तेल बाजार में ईरान की बार्गेनिंग पावर (सौदा करने की ताकत) को कई गुना बढ़ा दिया है. आइए विस्तार से समझते हैं कि कैसे ईरान ने इस भू-राजनीतिक संकट को एक नए ‘रेवेन्यू मॉडल’ में तब्दील कर दिया है.
होर्मुज जलडमरूमध्य से अमीर बनेगा ईरान:
ग्लोबल ऑयल मार्केट में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की हैसियत दुनिया की सबसे अहम ‘लॉजिस्टिक आर्टरी’ की है. दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल (Crude Oil) इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है. युद्ध के दौरान ईरान ने जब इस रास्ते को ब्लॉक किया, तो इसका सीधा असर ग्लोबल मार्केट्स पर दिखा. कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया और दुनिया भर की सप्लाई चेन बुरी तरह चरमरा गई. एक तरह से, ईरान ने दिखा दिया कि उसके पास दुनिया की अर्थव्यवस्था का ‘स्विच’ है. ऊर्जा संकट के इसी भारी दबाव ने अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जल्द से जल्द एक समझौते की मेज पर आने के लिए मजबूर किया।




