सामाजिक परिवर्तन केवल एक बदलाव नहीं, बल्कि रिश्तों की संवेदनशीलता में आई गहरी दरार का संकेत है: विजय जैन

रायपुर। लोकप्रिय मासिक पत्रिका छत्तीसगढ़ प्राइड के सलाहकार संपादक विजय जैन “गोधा” अलग अलग विषय पर लिखते रहते हैं। सामयिक विषयों में विशेष लेख लिखने वाले विजय जैन जी ने वर्तमान परिवेश में बच्चों और अभिभावकों के बीच रिश्ते को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए सारगर्भित लेख लिखा है। उन्होंने लिखा कि पहले बच्चे माँ-बाप का मुँह ताकते थे, अब माँ-बाप बच्चों का मुँह ताकते हैं…पहले बच्चे अपने हर निर्णय, हर ज़रूरत और हर सपने के लिए माता-पिता की ओर देखते थे। उनके लिए माता-पिता ही मार्गदर्शक, सहारा और जीवन का आधार होते थे। लेकिन आज समय ने एक ऐसा मोड़ लिया है जहाँ कई घरों में यह स्थिति उलटती हुई दिखाई देती है। अब माता-पिता ही अपने बच्चों की ओर आशा भरी निगाहों से देखने को मजबूर हो गए हैं। यह परिवर्तन केवल एक सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि रिश्तों की संवेदनशीलता में आई गहरी दरार का संकेत है।समय के साथ जीवनशैली में व्यापक बदलाव आया है। आधुनिकता, तकनीक, शिक्षा और वैश्वीकरण ने नए अवसर दिए, लेकिन इसके साथ ही परिवारों की संरचना भी बदल गई। संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल गए, जहाँ रिश्तों की गहराई की जगह सुविधा और स्वतंत्रता ने ले ली। पहले जहाँ तीन पीढ़ियाँ एक साथ रहती थीं, वहीं आज माता-पिता अक्सर अकेले रह जाते हैं—या तो बच्चों के विदेश चले जाने के कारण या उनके अपने अलग जीवन के चुनाव के कारण।इसके साथ ही आर्थिक स्वतंत्रता ने भी सोच को बदला है। पहले बच्चे आर्थिक रूप से माता-पिता पर निर्भर होते थे, इसलिए उनमें स्वाभाविक रूप से आदर और जुड़ाव होता था। आज बच्चे आत्मनिर्भर हैं, अपने निर्णय स्वयं लेते हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन इस आत्मनिर्भरता के साथ कई बार संवेदनशीलता और कर्तव्यबोध पीछे छूट जाता है।परिणामस्वरूप, माता-पिता जो बच्चों की हर ज़रूरत पूरी करते थे, आज अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए भी बच्चों की ओर देखने को विवश हो जाते हैं।एक और महत्वपूर्ण कारण है—मूल्यों और संस्कारों का धीरे-धीरे कमजोर होना। पहले परिवारों में “सेवा, त्याग और सम्मान” जैसे संस्कार जीवन का आधार थे। बच्चों को सिखाया जाता था कि माता-पिता केवल ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि भगवान का रूप हैं। आज की पीढ़ी ज्ञान और करियर में आगे बढ़ रही है, लेकिन कई बार इन मूल्यों को जीवन में उतारने में पीछे रह जाती है। व्यस्तता, करियर की दौड़ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ इतनी बढ़ गई हैं कि रिश्तों के लिए समय और भावनाएँ सीमित होती जा रही हैं।आज समाज में एक वाक्य अक्सर सुनने को मिलता है—“पहले बच्चे माँ-बाप का मुँह ताकते थे, अब माँ-बाप बच्चों का मुँह ताकते हैं।”यह वाक्य केवल एक शिकायत नहीं है, बल्कि हमारे समय की एक गहरी सामाजिक सच्चाई है। कभी माता-पिता परिवार का केंद्र होते थे, आज कई घरों में वे धीरे-धीरे किनारे कर दिए जाते हैं। कभी बच्चे अपने भविष्य के लिए माता-पिता की ओर देखते थे, आज कई माता-पिता अपने जीवन की छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए भी बच्चों की ओर देखने को मजबूर हैं।




