सामाजिक संतुलन की नई बिसात है छत्तीसगढ़ की राज्यसभा राजनीति?, रूमा सेनगुप्ता (लेखिका, पत्रकार

राज्यसभा के लिए छत्तीसगढ़ से हुए हालिया चुनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की राजनीति केवल दलों के बीच प्रतिस्पर्धा भर नहीं है, बल्कि वह गहरे सामाजिक समीकरणों की जमीन पर खड़ी है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से लक्ष्मी वर्मा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से फूलोदेवी नेताम का राज्यसभा में पहुंचना दरअसल उस व्यापक राजनीतिक संदेश को सामने लाता है, जो छत्तीसगढ़ की सामाजिक संरचना और चुनावी गणित दोनों से जुड़ा हुआ है।छत्तीसगढ़ की राजनीति को समझने के लिए उसके सामाजिक ढांचे को समझना जरूरी है। राज्य में आदिवासी समाज लगभग एक तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग 40 प्रतिशत से अधिक माना जाता है। यही कारण है कि यहां की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व केवल एक प्रतीकात्मक विषय नहीं, बल्कि सत्ता के संतुलन का आधार बन चुका है। संसद हो या विधानसभा, राजनीतिक दल यह भली-भांति जानते हैं कि समाज के बड़े वर्गों की भागीदारी के बिना दीर्घकालिक राजनीतिक आधार तैयार नहीं किया जा सकता।ऐसे परिदृश्य में लक्ष्मी वर्मा का चयन केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। वे कुर्मी समुदाय से आती हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग का एक प्रभावशाली घटक है और जिसकी छत्तीसगढ़ में अनुमानित हिस्सेदारी 6 से 8 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। यह समुदाय विशेष रूप से मध्य छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्रिय है। भाजपा ने लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा में भेजकर कई संदेश एक साथ देने की कोशिश की है-महिला नेतृत्व को आगे लाने का संकेत, संगठन के प्रति लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं को सम्मान और ओबीसी समाज के भीतर प्रभावशाली समूहों को प्रतिनिधित्व। लेकिन इन सबके बीच यह बात भी सही है कि लक्ष्मी वर्मा लंबे समय से भाजपा में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं और कई बड़ी जिम्मेदारियां सफलता के साथ पूरी कर चुकी है।दूसरी ओर कांग्रेस की राजनीति में फूलोदेवी नेताम की उपस्थिति उस ऐतिहासिक सामाजिक आधार की याद दिलाती है, जिस पर पार्टी ने लंबे समय तक अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की है। फूलोदेवी नेताम अनुसूचित जनजाति समाज से आती हैं और उनकी पहचान आदिवासी समुदाय की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाले नेताओं में रही है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां बस्तर और सरगुजा जैसे विशाल आदिवासी क्षेत्र राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं, वहां आदिवासी नेतृत्व को राष्ट्रीय राजनीति में स्थान देना कांग्रेस की स्वाभाविक रणनीति का हिस्सा माना जाता है।दिलचस्प तथ्य यह है कि दोनों दलों की राजनीतिक दिशा अलग होते हुए भी उनका संदेश कहीं न कहीं समान दिखाई देता है। भाजपा ओबीसी और महिला प्रतिनिधित्व के संयोजन के जरिए अपने सामाजिक आधार को विस्तार देने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस आदिवासी नेतृत्व को सामने रखकर अपने पारंपरिक समर्थन आधार को मजबूत बनाए रखना चाहती है। यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। अब राजनीति केवल विचारधारा या चुनावी वादों तक सीमित नहीं रह गई है; समाज के विभिन्न वर्गों को सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देना भी उतना ही आवश्यक हो गया है।लक्ष्मी वर्मा और और फूलोदेवी नेताम की राज्यसभा में मौजूदगी ज्यसभा में मौजूदगी इसी बदलती राजनीतिक समझ का संकेत देती है। एक ओर ओबीसी समाज की आकांक्षाओं को मंच मिलता है, तो दूसरी ओर आदिवासी समाज की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति मिलती है। यही वजह है कि इस चुनाव को केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दरअसल यह छत्तीसगढ़ की राजनीति में उस व्यापक सामाजिक संतुलन की झलक है, जिसके सहारे आने वाले वर्षों की राजनीतिक दिशा तय होने वाली है।




