छत्तीसगढ़
जीवन ये कैसा

बिना साज के गाना कैसा ।
बैंड बिना बाजा कैसा
शिकवा बिना शिकायत कैसी
खबर बिना वजह कैसी ।।
महफिल बिना गाना कैसा।
दर्शक बिना नाटक कैसा
दिन बिना रात कैसी
हार बिना जीत कैसी।।
सोच बिना समझ कैसी ।
इंतजार बिना मिलना कैसा
मिलन बिना विरह कैसी
ऐतराज़ बिना ऐतबार कैसा ।।
अंधेरे के बिना प्रकाश कैसा ।
चांद के बिना चांदनी कैसी
चाह बिना चाहत कैसी
खुशबू बिना फूल कैसा
चिड़िया बिना चहक कैसी ।।
शब्द बिना अर्थ कैसा ।
वचन बिना बंधन कैसा
बरसात बिना सावन कैसा
रंग बिना रंगपंचमी कैसी
पटाखे बिना दीवाली कैसी ।
राखी बिना रक्षाबंधन कैसा
नदी बिना किनारा कैसा
दर्द बिना दवा कैसी
ये जीवन कैसा ।।
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(कवियित्री:
श्रीमती चित्रलेखा बंजारे
रायपुर छग)




