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एक नौकरी मिल नहीं रही इसने की 2 सरकारी नौकरी, सात साल के कठोर कारावास की सजा

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बाराबंकी: एक ही व्यक्ति, एक मार्कशीट, दो जिले और दो सरकारी नौकरियां. जी हां, यूपी के बाराबंकी और प्रतापगढ़ जिलों से जुड़ा एक ऐसा ही मामला अब अदालत के फैसले के साथ सुर्खियों में है. यहां एक व्यक्ति ने दो अलग-अलग जिलों में सरकारी नौकरी हासिल की और वर्षों तक दोनों जगहों से सैलरी और भत्ते लेते रहा. करीब डेढ़ दशक तक यह सिलसिला चलता रहा, लेकिन अंततः सच सामने आ ही गया. सीजेएम सुधा सिंह ने आरोपी को दोषी करार देते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास और 30 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है. साथ ही सरकारी खजाने से लिए गए वेतन की वसूली का भी आदेश दिया गया है. मामला सतरिख थाना क्षेत्र के नरौली गांव निवासी जयप्रकाश सिंह से जुड़ा है. आरोप है कि उन्होंने फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेकर दो अलग-अलग जिलों के दो सरकारी विभागों में नौकरी हासिल कर ली। जांच में सामने आया कि जयप्रकाश सिंह की नियुक्ति जून 1993 में बाराबंकी जिले के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक पद पर हुई थी. लेकिन इससे पहले ही वह प्रतापगढ़ जिले में स्वास्थ्य विभाग में नॉन-मेडिकल असिस्टेंट के पद पर 26 दिसंबर 1979 को नियुक्त हो चुके थे. हैरानी की बात यह रही कि उन्होंने दोनों विभागों में एक ही मार्कशीट और दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की और लंबे समय तक दोनों जगह कार्यरत भी रहे. यही नहीं, वेतन और अन्य भत्ते भी दोनों विभागों से लेते रहे। सरकारी नियमों के अनुसार कोई भी कर्मचारी एक समय में केवल एक ही सरकारी पद पर कार्य कर सकता है. लेकिन जयप्रकाश सिंह के मामले में यह नियम पूरी तरह ध्वस्त होता दिखाई दिया. करीब 17 वर्षों तक वह प्रतापगढ़ और बाराबंकी दोनों जिलों में सरकारी कर्मचारी के रूप में दर्ज रहे. इस दौरान दोनों विभागों के रिकॉर्ड में उनका नाम मौजूद था और नियमित रूप से वेतन भी जारी होता रहा. यह सवाल भी उठता रहा कि आखिर इतने वर्षों तक यह मामला अधिकारियों की नजर से कैसे बचा रहा. लेकिन अंततः एक शिकायत ने इस पूरे प्रकरण का पर्दाफाश कर दिया। 20 फरवरी 2009 को शहर की आवास विकास कॉलोनी निवासी प्रभात सिंह ने इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. उन्होंने आरोप लगाया कि जयप्रकाश सिंह ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे दो अलग-अलग जगहों पर सरकारी नौकरी हासिल की है. इसके बाद सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत संबंधित विभागों से जानकारी मांगी गई. जब दोनों जिलों के रिकॉर्ड खंगाले गए तो चौंकाने वाला खुलासा सामने आया. दस्तावेजों से साफ हुआ कि जयप्रकाश सिंह एक ही समय में प्रतापगढ़ के स्वास्थ्य विभाग और बाराबंकी के शिक्षा विभाग में कर्मचारी के रूप में दर्ज थे. यही नहीं, दोनों विभागों से वेतन और भत्ते भी प्राप्त कर रहे थे। आरटीआई से मिले तथ्यों के आधार पर मामले की जांच शुरू हुई. जांच में आरोपों की पुष्टि होने के बाद जयप्रकाश सिंह के खिलाफ धोखाधड़ी और कूटरचना से जुड़े गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई. जांच के दौरान प्रतापगढ़ में उनकी नौकरी की भी पुष्टि हुई, जिसके बाद वहां से भी उन्हें निलंबित कर दिया गया. इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा और लंबी कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई. यह मामला अदालत में चलता रहा. इस दौरान अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्य और गवाहों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि आरोपी ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेकर सरकारी तंत्र को धोखा दिया. सभी पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुधा सिंह की अदालत ने जयप्रकाश सिंह को दोषी करार दिया. अदालत ने आरोपी को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई और 30 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया. इसके साथ ही सरकारी खजाने से लिए गए वेतन की वसूली का आदेश भी दिया गया. मामले में बाराबंकी के वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी अनार सिंह ने बताया कि वर्ष 2009 में यह मुकदमा दर्ज हुआ था. शिकायत मिलने के बाद जांच की गई तो यह सामने आया कि आरोपी प्रतापगढ़ में भी नौकरी कर रहा था. उन्होंने बताया कि जांच के बाद वहां से भी उसे निलंबित किया गया और मामला अदालत में चला. लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए सजा सुनाई है. यह मामला सामने आने के बाद सरकारी व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़े हुए हैं. आखिर कैसे एक व्यक्ति इतने लंबे समय तक दो अलग-अलग जिलों में सरकारी नौकरी करता रहा और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर में विभागों के रिकॉर्ड पूरी तरह डिजिटल नहीं थे, जिसकी वजह से इस तरह की अनियमितताएं लंबे समय तक छिपी रह जाती थीं. हालांकि अब डिजिटल रिकॉर्ड और आधार आधारित सत्यापन की वजह से ऐसे मामलों की संभावना काफी कम हो गई है।

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