छत्तीसगढ़

मुनीसुब्रत नाथ भगवान का जन्म एवं तप महोत्सव मनाया गया

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..रायपुर: अमलतास रेसीडेंसी, कचना स्थित श्री मुनीसुब्रत नाथ दिगंबर जैन मंदिर में स्थापित मुल प्रतिमा का जन्म एवं तप कल्याणक मनाया गया, जिसके अंतर्गत प्रातः 7 बजे श्री जी की चल प्रतिमा को रजत पालकी में विराजित कर शोभा यात्रा निकाली गयी,,तत्पश्चात भाई सुरेश मोदी के मार्गदर्शन में श्री जी की चल प्रतिमा को पाण्डुक शीला पर विराजित कर अभिषेक एवं शांति धारा एवं देव , शास्त्र, गुरु की पूजा के पश्चात 7:30 बजे समाधिस्थ संत शिरोमणी 108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के चरणों की स्थापना 81 शुद्ध मंत्रों के द्वारा की गई तत पश्चात मुनिसुब्रत नाथ भगवान का विधान बड़ी भक्ति भाव और संगीतमय माहौल में सम्पन्न हुआ..उपरोक्त जानकारी मंदिर के अध्यक्ष हिमांशु जैन ने दीभाई मोदी ने बताया कि जैन धर्म की वर्तमान चौबीसी के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ का जीवन संयम, करुणा और आध्यात्मिक तेज का एक अद्भुत संगम है। प्रभु के जन्म से पूर्व ही माता ने सोलह शुभ स्वप्न देखे थे, जो इस बात का संकेत थे कि उनके गर्भ में एक महान तीर्थंकर आत्मा का अवतरण होने वाला है। मुनिसुव्रतनाथ जी का शरीर ‘श्याम वर्ण’ (सांवला या नीला) था , जैन शास्त्रों के अनुसार, इनका काल अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है । इनके पिता श्री सुमित्र एवं माता का नाम श्यामा शास्त्रों में उल्लेखित है मुनिसुव्रतनाथ भगवान का लांछन (चिह्न) ‘कछुआ’ है, जो अध्यात्म की दृष्टि से अत्यंत गूढ़ संदेश देता है। जिस प्रकार कछुआ बाहरी विपदा आने पर अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, उसी प्रकार मुनिसुव्रत प्रभु का जीवन हमें अपनी इंद्रियों को संसार की बुराइयों से समेटकर अंतरात्मा में लीन होने की शिक्षा देता है।

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