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वो 5 पैंतरे…जिससे ‘कमजोर कड़ी’ से किंग बने नीतीश कुमार, चुपके से कैसे पलट दिया चुनावी गेम!

बिहार चुनाव में मिला बंपर बहुमत नीतीश कुमार की जीत है और, वास्तव में नीतीश कुमार ही वो नेता हैं जिनकी वजह से जेडीयू ने बेहतर प्रदर्शन बिहार चुनाव में किया है। सबसे अहम बात यह है कि नीतीश कुमार को बिहार के वोटरों की पूरी सहानुभूति भी मिली है। बीच-बीच में उनके खिलाफ सत्ता विरोधी लहर की चर्चा हो रही थी, लेकिन नतीजे तो साफ तौर पर सत्ता समर्थक लहर का संकेत दे रहे हैं।

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यह सहानुभूति नीतीश कुमार को लगभग वैसे ही मिली है, जैसा असर 2015 में उनके डीएनए पर उठे सवालों के समय देखा गया था। जिस तरह उन्हें बीमार मुख्यमंत्री और भ्रष्टाचार का भीष्म पितामह बताया गया, जनता ने इस नैरेटिव को पूरी तरह खारिज कर दिया। और सबसे बड़ी बात, नीतीश कुमार की माफी को लोगों ने स्वीकार भी कर लिया है। वह बार-बार बीजेपी नेतृत्व से माफी मांगते रहे। महागठबंधन के साथ जाने को लेकर उन्होंने लगातार दोहराया कि “दो बार गलती हो गई, अब कहीं नहीं जाएंगे” और सिर्फ मोदी-शाह ही नहीं बल्कि बिहार के लोगों ने भी उनकी माफी मान ली।

  1. वोटिंग से पहले कैश ट्रांसफर का सीधा असर

चुनाव की घोषणा से ठीक पहले बिहार सरकार ने पहली किस्त में 75 लाख महिलाओं के खातों में सीधे 10-10 हजार रुपये भेज दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से इस योजना का शुभारंभ किया। बाद में लाभार्थियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर पहुंच गई। बिहार चुनाव में यह एनडीए के लिए सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित होता दिख रहा है। महागठबंधन की तरफ से यह नैरेटिव चलाया गया कि यह राशि लोन है या अनुदान, लेकिन लगता है कि जनता पर इसका खास प्रभाव नहीं पड़ा।

तेजस्वी यादव को जैसे ही लगा कि नीतीश कुमार की यह चाल उन्हें पीछे कर सकती है, उन्होंने जीविका दीदियों के लिए नए वादे किए—30 हजार रुपये मासिक वेतन, सरकारी नियुक्ति और कई सुविधाओं का ऐलान। लेकिन लोगों ने वादों की बजाय मिल चुकी मदद पर अधिक भरोसा किया। डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का यह प्रयोग मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में सफल रहा है।

  1. शराबबंदी पर जनता की मुहर

2015 के चुनाव में महागठबंधन के नेता रहते हुए ही नीतीश कुमार ने शराबबंदी की मांग को समझा। महिलाओं के एक कार्यक्रम में इस मांग के उठते ही उन्होंने घोषणा कर दी कि वह सत्ता में लौटे तो पूर्ण शराबबंदी लागू करेंगे और वादा पूरा भी किया। शराबबंदी लागू होने के बाद कई तरह के सवाल उठे, अदालतों में केसों की बढ़ती संख्या पर भी आपत्ति जताई गई, लेकिन नीतीश कुमार अपने फैसले से पीछे नहीं हटे।

जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने जरूर कहा था कि उनकी सरकार बनी तो वह शराबबंदी खत्म कर देंगे। तेजस्वी यादव ने भले खुलकर ऐसा वादा नहीं किया, लेकिन समीक्षा की बात जरूर कहते थे। जनादेश से साफ हो गया कि बिहार के लोग विशेषकर महिलाएं शराबबंदी को जारी रखना चाहती हैं।

  1. ‘ब्रांड नीतीश’ पर वोटरों का भरोसा

2005 से नीतीश कुमार ने ‘सुशासन बाबू’ की जो छवि बनाई है, नतीजे यह बताते हैं कि वह अभी भी बरकरार है। बिहार में बिजली व्यवस्था, गांव-गांव तक सड़कें, इन सबने लोगों को विश्वास दिलाया कि विकास आगे भी जारी रहेगा।

हालांकि चुनाव से पहले अपराध की कई घटनाएं हुईं और कानून व्यवस्था को लेकर सवाल उठे, लेकिन बीजेपी के साथ मिलकर नीतीश कुमार ने ‘जंगलराज’ की याद दिलाई और नैरेटिव को जल्दी ही बदल दिया। भले ही नीतीश को ‘पलटू राम’ कहा गया, लेकिन काम के बल पर जेडीयू नेता ने इन आरोपों का जवाब दे दिया।

  1. महिला वोटरों का नीतीश पर विश्वास

महिलाओं के लिए योजनाएं नीतीश कुमार ने सरकार बनते ही शुरू कर दी थीं। जिन लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल दी गई थी, वे अब बड़ी हो चुकी हैं, परिवार बसा चुकी हैं और नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए और भी योजनाएं लेकर आए। नौकरियों में आरक्षण, पंचायतों में आरक्षण, आशा वर्करों के लिए सुविधाओं का बढ़ना इन सबने असर दिखाया। महिलाओं के लिए वादे तेजस्वी और राहुल गांधी ने भी किए, लेकिन नीतीश कुमार ने चुनाव से पहले ही फायदा देकर विश्वास बनाए रखा।

  1. सहानुभूति भी नीतीश कुमार के साथ

नीतीश कुमार पर निजी हमले काफी किए गए। प्रशांत किशोर तो तीन साल से उनके खिलाफ अभियान चला रहे थे। तेजस्वी यादव भी उन्हें बीमार मुख्यमंत्री और भ्रष्टाचार का भीष्म पितामह कहने लगे थे। प्रशांत किशोर ने तो सरकार से मुख्यमंत्री का हेल्थ बुलेटिन जारी करने की मांग भी कर दी। नतीजों ने दिखा दिया कि बिहार के लोगों को ये सब रास नहीं आया और उन्होंने इस नैरेटिव को सीधे तौर पर खारिज कर दिया है।

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