हरेली मनाएँ, हरियाली बचाएँ: नीम की डालियाँ न तोड़ें, आवश्यकता हो तो कुछ पत्तियाँ ही लें: डॉ. दिनेश मिश्र

रायपुर। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. दिनेश मिश्र ने हरेली पर्व के अवसर पर नागरिकों से प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने की अपील की है। उन्होंने कहा कि हरेली छत्तीसगढ़ की प्रकृति, कृषि और हरियाली से जुड़ा प्रिय लोकपर्व है। यह पर्व प्रकृति तथा पेड़-पौधों के प्रति हमारे सम्मान और कृतज्ञता की भावना को व्यक्त करता है।बदलते समय में परंपराओं को प्रकृति के अनुकूल बनाना जरूरी
डॉ. मिश्र ने कहा कि हरेली के अवसर पर बुरी नजर से बचाने के लिए नीम की पत्तियों अथवा छोटी टहनियों को घर के द्वार पर लगाने की परंपरा अनेक स्थानों पर प्रचलित है। कई लोग इन्हें अपने वाहनों पर भी लगाते हैं। लेकिन समय के साथ हमारी परिस्थितियाँ काफी बदल गई हैं। आज आबादी बढ़ने के साथ शहरों और गांवों में पेड़ों तथा हरित क्षेत्र पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।उन्होंने कहा कि पहले की तुलना में आज पेड़ों की संख्या और प्राकृतिक वनस्पतियों पर अधिक दबाव है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में लोग एक ही दिन नीम की बड़ी-बड़ी डालियाँ तोड़ेंगे, तो इसका पेड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।पेड़ भी जीवित प्राणी हैं डॉ. मिश्र ने कहा कि पेड़ भी जीवित प्राणी हैं। हरी पत्तियों में सूर्य के प्रकाश की सहायता से वे अपना भोजन बनाते हैं। इसलिए अनावश्यक रूप से बड़ी मात्रा में पत्तियाँ तोड़ना अथवा शाखाओं को काटना उचित नहीं है। इससे पेड़ की भोजन बनाने की क्षमता प्रभावित होती है तथा शाखाओं को नुकसान पहुँचने से पेड़ पर अनावश्यक तनाव और घाव उत्पन्न हो सकते हैं।उन्होंने कहा, “जिस प्रकार हम किसी जीवित प्राणी को अनावश्यक चोट पहुँचाना उचित नहीं मानते, उसी प्रकार प्रकृति और पेड़-पौधों के प्रति संवेदनशीलता और करुणा रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।”हरेली पर लें पर्यावरण संरक्षण का संकल्पडॉ. मिश्र ने नागरिकों से अपील की कि हरेली की परंपरा को पूरी श्रद्धा और उत्साह से निभाएँ, लेकिन उसे प्रकृति के अनुकूल तरीके से मनाएँ। उन्होंने सुझाव दिया कि—- नीम की बड़ी-बड़ी डालियाँ न तोड़ी जाएँ।- आवश्यकता के अनुसार केवल कुछ पत्तियाँ ही ली जाएँ।- पेड़ों की शाखाओं को न काटा जाए।- हरेली के अवसर पर नीम एवं अन्य उपयोगी पौधे लगाए जाएँ।- परंपराओं का पालन अंधविश्वास के बजाय प्रकृति के प्रति सम्मान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ किया जाए।उन्होंने कहा कि हरेली का भाव ही हरियाली और प्रकृति से जुड़ा हुआ है। जिस पर्व पर हम प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं, उस दिन प्रकृति को अनावश्यक नुकसान पहुँचाना इस पर्व की मूल भावना के अनुरूप नहीं होगा।डॉ. मिश्र ने कहा कि हमारी परंपराएँ हमारी पहचान हैं और उन्हें सम्मान के साथ आगे बढ़ाना हमारा दायित्व है। साथ ही, बदलते पर्यावरणीय परिस्थितियों को देखते हुए परंपराओं को प्रकृति के हित में अपनाना भी हमारी जिम्मेदारी है।उन्होंने नागरिकों से आह्वान किया “परंपरा भी निभाएँगे, पेड़ भी बचाएँगे।हरेली मनाएँगे, हरियाली बचाएँगे।”
**डॉ. दिनेश मिश्रअध्यक्ष, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति




