इस साल बाजार में जितने जामुन दिख रहे हैं, उतने पिछले तीन दशकों में कभी नहीं देखा गया: सूखे की आशंका


रायपुर । अतुल पब्लिसिटी के संचालक श्री अतुल जैन ने सोशल मीडिया में बुजुर्गों की कहे बातों को शेयर किया है। समय समय पर श्री अतुल जैन जी मुख्तलिफ मौजूआत पर रौशनी डालते रहते हैं। उनका कहना भी हर्फ़ ब हर्फ़ यानी अक्षरशः सही होता है, हमारे बुजुर्गों और पुराने जमाने के लोगों के पास जीवन का भरपूर तजुर्बा होता है, और वही बात उनके कहे गए कलामों या कहावतों में झलकता है जो वर्तमान में सच भी साबित होते दिखता है। समय और विज्ञान के साथ-साथ यह साबित हुआ है कि उनकी बातें केवल अंधविश्वास नहीं बल्कि गहरे तजुर्बा और दानिशमंदी पर आधारित होती थी। कुछ ऐसे ही कुछ मिसाल हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं, जैसे कि पुराने लोग पक्षियों की उड़ान या हवा की दिशा देखकर बारिश का सटीक अनुमान लगा लेते थे। आज का भारतीय मौसम विज्ञान विभाग भी उन्हीं प्राकृतिक संकेतों और आधुनिक रडार का उपयोग करके सटीक मौसम की जानकारी देता है। बुजुर्ग हमेशा सुबह जल्दी उठने की सलाह देते हैं जो कि शुद्ध हवा और शांत वातावरण मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे उत्तम माना जाता है जो आज भी जारी है मार्निंग वॉक के रूप में। ऋतु के अनुसार खान-पान को देखें तो सर्दियों में तिल-गुड़ और गर्मियों में सत्तू जैसी चीजें खाने की परंपरा थी। देखा जाए तो बुजुर्गों की बातें वैज्ञानिक या ऐतिहासिक सच्चाई को सच्चाई के साथ नई पीढ़ी को रास्ता भी दिखाता है। इस बार अतुल जैन साहब ने जामुन की बढ़ी तादात पर दादी की कहीं बातों को शेयर किया है जो पाठकों को शेयर कर रहा हूं:-जामुनों की जैसे बाढ़ आ गई है। जिन पेड़ों पर पिछले साल गिने-चुने फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुनों से लदे हैं। जिन पेड़ों पर फल आए थे, वहाँ तो जामुनों का ढेर लग गया है।
*ये आखिर हो क्या रहा है?*हमारी दादी बस यही कहती थीं कि “जिस गर्मी में जामुनों का ऐसा ढेर लगता है, उस साल सूखा पड़ता है”। दादी का ये पारंपरिक ज्ञान वनस्पति विज्ञान के हिसाब से बिल्कुल सही और सटीक है। विज्ञान में इस दिलचस्प और उतनी ही चौंकाने वाली प्रक्रिया को *“मास्टिंग” (Masting)* या *“स्ट्रेस फ्रूटिंग” (Stress Fruiting)* कहा जाता है।पेड़ों द्वारा खुद को झोंककर ज्यादा से ज्यादा फल देने की इस आखिरी कोशिश को कभी-कभी *“सुसाइड फ्रूटिंग” (Suicide Fruiting)* या *“बंपर क्रॉप”* भी कहते हैं।ये आखिर है क्या और इसके पीछे का विज्ञान क्या कहता है, इसे आसान भाषा में समझते हैं:
*1. ‘सर्वाइवल इंस्टिंक्ट’ – अस्तित्व की लड़ाई* जैसा प्रोफेसर मैडम ने बताया, ये प्रकृति का “अपने जीन आगे बढ़ाने का” नियम है। जब पेड़ को जमीन के नीचे पानी की कमी महसूस होने लगती है या मौसम में बड़े बदलावों के संकेत मिलते हैं, तो पेड़ “डिफेंस मोड” में चला जाता है। पेड़ को आभास हो जाता है कि शायद वो आगे जी न पाए। ऐसे समय में खुद को बचाने के बजाय, अपनी प्रजाति को धरती पर बनाए रखने के लिए पेड़ अपनी पूरी ऊर्जा “बीज” यानी फल बनाने में लगा देता है।
*2. नई पत्तियों-डालियों पर रोक* ऐसे साल में पेड़ नई पत्तियाँ फूटना या डालियाँ बढ़ाना पूरी तरह रोक देता है। क्योंकि नई पत्तियों को जिंदा रखने के लिए ज्यादा पानी और पोषण चाहिए। पेड़ वो ऊर्जा बचाकर सिर्फ और सिर्फ जामुन का उत्पादन बढ़ाने पर लगाता है। इसी वजह से पिछले साल जिन पेड़ों पर थोड़े-बहुत फल थे, वे भी इस साल फलों से भर गए हैं।
*3. दादी की भविष्यवाणी और विज्ञान – सूखे से संबंध* दादी का अवलोकन बिल्कुल सटीक है, क्योंकि पेड़-पौधे मौसम में बदलाव को इंसानों से कहीं पहले और ज्यादा संवेदनशीलता से पहचानते हैं।जामुन की जड़ “तप जड़” (Taproot) होती है, जो जमीन की काफी गहराई तक जाती है।जब भूजल का स्तर बहुत ज्यादा नीचे चला जाता है, तभी इन जड़ों को तनाव (Water Stress) महसूस होता है।यही पानी का तनाव आने वाले सूखे या कड़ी गर्मी का संकेत होता है।इसलिए, जिस साल गर्मी में जामुनों का ऐसा अभूतपूर्व ढेर लगता है, वो प्रकृति की तरफ से आने वाले सूखे समय की चेतावनी होती है।
*संक्षेप में कहें तो...* जामुन का पेड़ आत्महत्या नहीं कर रहा, बल्कि अपना बलिदान देकर अपनी अगली पीढ़ी यानी बीजों को जन्म देने की कोशिश कर रहा है। प्रकृति का ये चक्र वाकई हैरान करने वाला है। दादी का पीढ़ियों पुराना अवलोकन और विज्ञान के सिद्धांत यहाँ बिल्कुल मिल जाते हैं।इस साल जामुन का स्वाद जरूर लें, लेकिन प्रकृति के इस “सूखे” के संकेत को गंभीरता से लें और पानी व संसाधनों का इस्तेमाल सोच-समझकर करें, यही इससे समझ आता है।




