-ए-मीना की जियारत: सब्र, कुर्बानी और अल्लाह की इताअत का पैगाम

वादी ए मीना (मक्का शरीफ) मे है। हम लोग मक्का शरीफ जियारत के लिए निकले थे उस वक्त इस जगह के बारे मे बताया और दिखाया गया था। यह वह महत्वपूर्ण जगह है, जहाँ रिवायत के मुताबिक हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह तआला के हुक्म पर अपने बेटे हज़रत इस्माइल (अलैहिस्सलाम) को कुर्बानी के लिए लिटाया था और फिर अल्लाह तआला ने फिदीये के तौर पर एक मेढ़ा (जन्नती दुंबा)भेजा था। और उसी की कुर्बानी हुई। अरब में दुंबा भी काफी तादात में हैं जो हमको बस से सफर करते वक्त जगह जगह दिखाई दिया। जिस जगह हजरत इस्माइल अलैहिहिस्लाम को कुर्बान करने लिटाया गया था उस जगह पर निशानी के तौर पर एक टॉवर जैसे बना दिया गया है जिसे लोग देखें और इबरत हासिल करें।

यह मुबारक जगह “अल-खैफ मस्जिद” के पीछे है, और यहाँ निशानी के तौर पर एक छोटा मीनार जैसे बनाया गया है ताकि यह ऐतिहासिक जगह यादगार बनी रहे। सऊदी हुकूमत ने कई जगहों को सेफ रखा है जो मेरे आका हुजूर अकरम स अ व और सहाबियों की निशानी है और कई निशानियों, जगहों को तब्दील कर दिया है। उनसे पूछने पर उनका कहना होता है ये सब Biddat है, या लोग हज तवाफ और उमरा को भूल कर इन जगहों पर ही डटे रहेंगे और इसे हज उमराह का एक अरकान समझ लेंगे। देखने में आया है कि अरबियों का सिर्फ एक ही बात पर जोर रहता है वो है नमाज़।

बहरहाल यह जगह और वाकया हमें सिर्फ़ कुर्बानी के बारे में नहीं सिखाती बल्कि, यह हमें सिखाती है कि अल्लाह के हुक्म के आगे अपनी ख्वाहिशों और मोहब्बत को कुर्बान करना ही सच्ची इबादत है लेकिन इसी बात को लेकर वाट्सअप में लोग मैसेज देकर मसखरी भी कर रहे हैं जैसे कि कुर्बानी का बकरा बेऐब हो लेकिन कुर्बानी करने वाला भले ही झूठा, मक्कार और न जाने क्या क्या हो। बहरहाल जिसने भी मेसेज किया है गलत तो नहीं है लेकिन सवाल उठता है ये सब बातें अभी ही क्यों होती है। झूठ, गिबत, मक्कारी से तो हमेशा दूर रहना चाहिए। अल्लाह हम सबको नेक तौफीक दे और ऐसे कामों से बचाए जिससे उनकी नाराज़गी झेलना पड़े।

कुछ देशों के हाजी ग्रुप में ही चलते हैं और उनका ड्रेस कोड भी रहता है। इसका ये भी फ़ायदा होता है कि अगर कोई साथी बिछड़ जाए तो अलग से पहचान में आ जाते हैं। हज के दौरान देखा गया है कि सभी हाजी एक ही ड्रेस यानी अहराम पहने हुए होते हैं। ये सभी एक समूह में चलते हुए लब्बैक और दीगर कलमात पढ़ते रहते हैं जो लगभग वर्ल्ड के विभिन्न देशों से हाजी भी पढ़ते हैं। सबकी बोली भाषण अलग अलग है लेकिन हरम शरीफ में पहुंचने के बाद सबकी बोली एक हो जाती है ये भी कुदरत का अनोखा करिश्मा है। सबके जुबान से एक ही सदा निकलती है। ईरान, इराक,सूडान, अफ्रीका इंडोनेशिया, लेबनान, भारत पाकिस्तान सहित पूरे विश्व के लोग इकट्ठे हुए हैं। भारत से केरल के हाजियों को देखा जो केरल स्टेट हज कमेटी का स्कार्फ पहने रहते हुए वे भी एक समूह में चलते हैं। देखा गया है कि इस तरह के ड्रेस पहनने से ग्रुप वालों को पहचानने में मदद मिलती है।

ग्रुप वालों की एक खास बात यह है कि ये बड़े ग्रुप में सफर करते हैं और ऑर्गनाइज़्ड तरीके से इबादत करते हैं। बाहर से आए हाजियों का ड्रेस तो एक जैसे रहता ही है इनका सूटकेस भी एक ही कलर और एक ही साइज़ का होता है। जिसकी तादात एक समूह में लगभग 100 से 150 तक होती है।
तवाफ़ के दौरान हो या सफ़ा और मरवाह की सई के दौरान, ये लोग एक साथ आगे बढ़ते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं और दुआए करते हैं।
उनका यह मिलकर किया जाने वाला स्टाइल इबादत, व्यवस्था और एकता का एक खूबसूरत नज़ारा पेश करता है जो मस्जिद ए हराम में अलग-अलग देशों से आने वाले यात्रियों के बीच एक खास रूहानी रंग पैदा करता है। यहां बहुत ही खूबसूरत मंजर होता है।




